क्या एहसास है उन लोगों का,
जिन्हे कोई अपना नहीं मिल पाता
ज़िन्दगी तोह मिली मगर
जहां नहीं मिल पाता।
घर तो बनते है
पर
फिर भी क्यों बेघर है यह लोग।
क्या विकास के नाम पर ग़रीबी का तमाशा है यह ?
या फिर !दूसरों के घर की कीमत है यह ?
हम कबसे इतने स्वार्थी बन गए ?
दूसरों का घर उजार कर खुद का बसाने का ख्वाब देखने लगे।
जिन्हे कोई अपना नहीं मिल पाता
ज़िन्दगी तोह मिली मगर
जहां नहीं मिल पाता।
घर तो बनते है
पर
फिर भी क्यों बेघर है यह लोग।
क्या विकास के नाम पर ग़रीबी का तमाशा है यह ?
या फिर !दूसरों के घर की कीमत है यह ?
हम कबसे इतने स्वार्थी बन गए ?
दूसरों का घर उजार कर खुद का बसाने का ख्वाब देखने लगे।

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